The Delhi High Court has given a big decision regarding disability pension for army personnel,

 सेना के जवानों के लिए विकलांगता पेंशन को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है,


 जिससे रक्षा मंत्रालय को झटका लगा है. इस फैसले ने उन सैकड़ों पूर्व सैन्यकर्मियों को राहत दी है जिनकी विकलांगता पेंशन को "न तो सेवा के कारण हुई और न ही सेवा से बढ़ी" (NANA) बताकर अस्वीकार कर दिया गया था.

रक्षा मंत्रालय की मनमानी पर लगाम


पिछले साल दिसंबर में, इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट 'War Over The Wounded' में बताया था कि कैसे रक्षा मंत्रालय अदालतों में सैकड़ों अपीलें दायर कर रहा था, जो कि विकलांगता पेंशन का विरोध कर रही थीं.

 यह सरकार की खुद की उस नीति के खिलाफ था जिसमें मुकदमेबाजी को कम करने की बात कही गई थी.



यहाँ तक कि पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और निर्मला सीतारमण ने भी निर्देश दिए थे कि विकलांगता लाभ देने वाले ट्रिब्यूनल के आदेशों को चुनौती न दी जाए, लेकिन मंत्रालय ने विधवाओं और विकलांग सैनिकों के खिलाफ भी अपीलें दायर करना जारी रखा.

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


जस्टिस नवीन चावला और शालिंदर कौर की डिवीजन बेंच ने लगभग 300 याचिकाओं को खारिज करते हुए, सशस्त्र बल ट्रिब्यूनल के उन फैसलों को बरकरार रखा जो दिग्गजों के पक्ष में थे. अदालत ने साफ कहा कि

 विकलांगता पेंशन देना कोई "उदारता का कार्य नहीं है, बल्कि उनके बलिदानों की एक सही और न्यायपूर्ण स्वीकारोक्ति है" जो उन्होंने सेवा के दौरान झेलीं और जिसके परिणामस्वरूप उन्हें विकलांगता या बीमारियाँ हुईं.

सरकार का तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया


सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि विकलांगता का आकलन रिलीज़ मेडिकल बोर्ड (RMB) द्वारा किया गया था और इसे सैन्य सेवा के कारण या उससे बढ़ा हुआ नहीं माना गया था. उन्होंने यह भी कहा कि

 मेडिकल बोर्ड विशेषज्ञों से बना होता है और अदालत को उनके फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि कोई ठोस चिकित्सा प्रमाण न हो.


हालांकि, कोर्ट ने इस पर जोर दिया कि सशस्त्र बलों के जवान बेहद कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं, जहाँ हर दिन जीवित रहना एक चुनौती है. इसलिए, RMB की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने निष्कर्षों के लिए ठोस और अच्छी तरह से तर्कपूर्ण औचित्य प्रस्तुत करे कि किसी

 जवान की बीमारी या विकलांगता सेवा की शर्तों के कारण नहीं हुई या बढ़ी नहीं. कोर्ट ने कहा कि RMB केवल इस बात पर निर्भर करके अपनी जिम्मेदारी से नहीं हट सकता कि बीमारी पहली बार कब देखी गई.

शांत क्षेत्रों में भी सेवा का तनाव


कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात उठाई कि शांति वाले स्थानों पर भी सैन्य सेवा अंतर्निहित रूप से तनावपूर्ण होती है. इसमें सख्त अनुशासन, लंबे काम के घंटे,

 सीमित व्यक्तिगत स्वतंत्रता और तैनाती के लिए लगातार तैयारी शामिल है. परिवार से दूर रहने, अलग-थलग या चुनौतीपूर्ण वातावरण में रहने, और अचानक तबादलों या कर्तव्यों की अनिश्चितता से निपटने का मनोवैज्ञानिक

 बोझ भी इसमें जुड़ता है. कोर्ट ने कहा कि सैनिक हमेशा इस बात से अवगत रहते हैं कि खतरा कभी दूर नहीं होता, जिससे मानसिक और भावनात्मक तनाव की स्थिति बनी रहती है.

कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि सैन्य सेवा, चाहे वह शांति वाले स्थानों पर हो या ऑपरेशनल ज़ोन में, अंतर्निहित रूप से तनाव पैदा करती है जिससे सशस्त्र बल के कर्मियों को चिकित्सा स्थितियों, जैसे कि उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), का खतरा हो सकता है.

यह फैसला भारतीय सशस्त्र बलों के उन वीरों के लिए एक बड़ी जीत है जिन्होंने देश की सेवा में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया है. यह सुनिश्चित करता है कि उनके बलिदान को पहचाना जाए और उन्हें वित्तीय सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार मिले. Satyamev Jayate

Previous Post Next Post